समय की लिपि
किसने कहा इतिहास मेरा है या तुम्हारा
यह तो एक समूह है जो इधर से गुज़र गया एक ख्याल है जो करवट बदल कर सो गया एक तारीख है जो समय की लिपि से मिटी जाती है आज जिन तालिबान ने बुद्ध के अवशेष्ण को नष्ट किया कल वो भी समय की लिपि पर बिखर जाएँगे माना जीने के लिए हम सब का सार्थक होना ज़रूरी है पर किसी की सार्थकता को निरर्थक बनाना ज़रूरी तो नहीं समय की लिपि पर कुरेद कर अपना पता लिख भी दिया तुमने तो भी इतिहास न मेरा है न तुम्हारा यह तो एक समूह है जो इधर से गुज़र गया एक गुमनाम पता है जो आगे मोड़ पर जा कर बिखर गया। |
Wednesday, September 21, 2011
आराम करो
एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।
यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ -- है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।
मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ -- सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।
अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।
मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।
- गोपालप्रसाद व्यास
Sunday, September 18, 2011
अमर रहेगी यह कथा
जब स्टैन ली का काल्पनिक चरित्र स्पाइडरमैन दीवारों पर फांदना सीख रहा होगा, तब अपने देश में कपिश नाम का एक कार्टून किरदार एक डाल से दूसरे डाल पर कूदते-फांदते, लाखों-करोड़ों बच्चों के दिल में उतर चुका था। यह उस जमाने की बात है, जब अपने यहां कार्टून पढ़ने की चीज होती थी और जब जॉर्ज रेमी के नन्हें से कार्टून टिनटिन बनने का सपना देख-देखकर ऊब चुके थे बच्चे। वाल्ट डिज्नी के कार्टून कैरेक्टर डॉनल्ड को चाहने वाले होने लगे थे बूढ़े।
तभी एक चाचा आए थे, जिनके पास बच्चों के लिए बहुत कुछ था। कार्टून के नए किरदार, नई कहानियां और नया अंदाज। भारतीय कॉमिक्स की दुनिया एक झटके में बदल गई। कॉमिक्स न पसंद करने वाले कड़क शिक्षकों और कॉमिक्स को बरबादी का कारण मानने वाले सख्त मिजाज अभिभावकों का नजरिया भी बदल गया। अब बच्चों के बस्तों में, बिस्तरों पर और आपसी बहसों में चाचा के कार्टून किरदार धमा चौकड़ी मचाने लगे थे और अपने कार्टून किरदारों के साथ बच्चों के चाचा यानी अनंत पई भी घर-घर में मशहूर हो गए। इन कार्टूनोें के किरदार बच्चों को सिर्फ हंसा ही नहीं रहे थे, भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं को भी सुना रहे थे। पहली बार देश की भाषा में देश की मासूमियत को हंसी की नई खुराक मिली थी। अनंत पई पहले भारतीय थे, जिन्होंने भारतीय महाकाव्यों, पौराणिक और एतिहासिक कथाओं पर आधारित अमर चित्र कथा शृंखला की किताबों की शुरुआत की। लेकिन यह आसान काम नहीं था। बच्चों तक पहुंचने से पहले बड़ों की जेब तक पहुंचना जरूरी था। जोखिम न लेने को तैयार प्रकाशकों को मनाना था। क्योंकि जब अमर चित्र कथा को सामने लाने की बात हो रही थी, तब बाजार में अमेरिका के कार्टून किरदार टिनटिन की धूम थी। पई कई प्रकाशकों से निराश होकर लौट चुके थे, तभी इंडिया बुक हाउस के मालिक जी एल मीरचंदानी को पई की बातों से भरोसा हुआ और वह अमर चित्र कथा को छापने के लिए राजी हो गए।
उस वक्त पई टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में इंद्रजाल कॉमिक्स के लिए काम कर रहे थे। उन्होंने अमर चित्र कथा के प्रकाशन के इरादे के साथ नौकरी छोड़ दी थी। अमर चित्र कथा का प्रकाशन 1967 में शुरू हुआ था। भारत के महापुरुष, वीर महिलाएं, प्रख्यात वैज्ञानिक, स्वतंत्रता सेनानी और पौराणिक पात्र जैसी शृंखलाओं के साथ अमर चित्र कथा की कामयाबी ने भी एक इतिहास रच डाला।
इतिहास से लेकर महापुरुषों के जीवन चरित्र तक, मायथॉलॉजी से लेकर हास्य विनोद तक, प्राचीन भारतीय महाकाव्यों से लेकर सुरुचिपूर्ण आधुनिक ग्रंथों तक का संसार समेटे पांच सौ के लगभग अमर चित्र कथाएं बेनटेन और मिकी माउस के जमाने में भी बच्चों को गुदगुदाती हैं, बच्चों में पढ़ने की आदत डालती हैं, तो इसके पीछे चाचा पई की वही सोच है। वह जानते थे कि बच्चों को पढ़ाना है, तो पहले उसे हंसाओ और फिर खेल-खेल में पढ़ाओ। फिर स्कूलों की लाइब्रेरी में अमर चित्र कथा की खरीद शुरू हो गई। इसके बाद तो इसकी बिक्री ने भी एक इतिहास रच डाला। आज भी कई भाषाओं में उसका प्रकाशन होता है और प्रति वर्ष उसकी 30 लाख से अधिक प्रतियां बिकती हैं।
1980 में अनंत पई ने हिंदी और अंगरेजी में बच्चों की एक लोकप्रिय पत्रिका ‘टिंकल’ का भी प्रकाशन शुरू किया। इस पत्रिका में अंकल पई के नाम से वह बच्चों के सवालों का जवाब देते थे। यह पत्रिका बच्चों में इस कदर मशहूर थी कि जिसके सवाल उसमें छप जाते थे, वह बच्चा मुहल्ले का हीरो तो हो ही जाता था। इसी दौरान अनंत पई ने शिकारी शंभू, कालिया द क्रो, तंत्री द मंत्री ,‘रामू और श्यामू’ और ‘कपिश’ जैसे लोकप्रिय कॉमिक किरदारों को जन्म दिया, जो वर्षों तक भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे। आज जब पई हमारे बीच नहीं हैं, तो सबके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारे देश के कार्टून किरदार भी अब विदेशी रंग में रंग जाएंगे। क्योंकि, तकनीकी विस्फोट और साधनों के लोकतंत्रीकरण से विदेशी कार्टून किरदारों की लंबी फौज हमारे घरों में आ घुसी है। ऐसे में अपने देश में कार्टून के किरदारों को जन्म देने वाले क्या उस रास्ते पर चलेंगे, जो अंकल पई ने दिखाया था। क्या डोरेमॉन के जमाने में शिकारी शंभू की कोई सुनेगा? कई पीढ़ी जिन कथाओं को पढ़ते हुए और जिन कार्टून किरदारों को देखते हुए जवान हुई है, क्या उन किरदारों को कोई याद करनेवाला नहीं होगा? शायद ऐसा नहीं होगा, क्योंकि देश की भाषा में देश की मासूमियत को मुसकान देने के जो फॉरमूले चाचा पई ने दिए है, वे जल्दी नहीं चूकने वाले।
तभी एक चाचा आए थे, जिनके पास बच्चों के लिए बहुत कुछ था। कार्टून के नए किरदार, नई कहानियां और नया अंदाज। भारतीय कॉमिक्स की दुनिया एक झटके में बदल गई। कॉमिक्स न पसंद करने वाले कड़क शिक्षकों और कॉमिक्स को बरबादी का कारण मानने वाले सख्त मिजाज अभिभावकों का नजरिया भी बदल गया। अब बच्चों के बस्तों में, बिस्तरों पर और आपसी बहसों में चाचा के कार्टून किरदार धमा चौकड़ी मचाने लगे थे और अपने कार्टून किरदारों के साथ बच्चों के चाचा यानी अनंत पई भी घर-घर में मशहूर हो गए। इन कार्टूनोें के किरदार बच्चों को सिर्फ हंसा ही नहीं रहे थे, भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं को भी सुना रहे थे। पहली बार देश की भाषा में देश की मासूमियत को हंसी की नई खुराक मिली थी। अनंत पई पहले भारतीय थे, जिन्होंने भारतीय महाकाव्यों, पौराणिक और एतिहासिक कथाओं पर आधारित अमर चित्र कथा शृंखला की किताबों की शुरुआत की। लेकिन यह आसान काम नहीं था। बच्चों तक पहुंचने से पहले बड़ों की जेब तक पहुंचना जरूरी था। जोखिम न लेने को तैयार प्रकाशकों को मनाना था। क्योंकि जब अमर चित्र कथा को सामने लाने की बात हो रही थी, तब बाजार में अमेरिका के कार्टून किरदार टिनटिन की धूम थी। पई कई प्रकाशकों से निराश होकर लौट चुके थे, तभी इंडिया बुक हाउस के मालिक जी एल मीरचंदानी को पई की बातों से भरोसा हुआ और वह अमर चित्र कथा को छापने के लिए राजी हो गए।
उस वक्त पई टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में इंद्रजाल कॉमिक्स के लिए काम कर रहे थे। उन्होंने अमर चित्र कथा के प्रकाशन के इरादे के साथ नौकरी छोड़ दी थी। अमर चित्र कथा का प्रकाशन 1967 में शुरू हुआ था। भारत के महापुरुष, वीर महिलाएं, प्रख्यात वैज्ञानिक, स्वतंत्रता सेनानी और पौराणिक पात्र जैसी शृंखलाओं के साथ अमर चित्र कथा की कामयाबी ने भी एक इतिहास रच डाला।
इतिहास से लेकर महापुरुषों के जीवन चरित्र तक, मायथॉलॉजी से लेकर हास्य विनोद तक, प्राचीन भारतीय महाकाव्यों से लेकर सुरुचिपूर्ण आधुनिक ग्रंथों तक का संसार समेटे पांच सौ के लगभग अमर चित्र कथाएं बेनटेन और मिकी माउस के जमाने में भी बच्चों को गुदगुदाती हैं, बच्चों में पढ़ने की आदत डालती हैं, तो इसके पीछे चाचा पई की वही सोच है। वह जानते थे कि बच्चों को पढ़ाना है, तो पहले उसे हंसाओ और फिर खेल-खेल में पढ़ाओ। फिर स्कूलों की लाइब्रेरी में अमर चित्र कथा की खरीद शुरू हो गई। इसके बाद तो इसकी बिक्री ने भी एक इतिहास रच डाला। आज भी कई भाषाओं में उसका प्रकाशन होता है और प्रति वर्ष उसकी 30 लाख से अधिक प्रतियां बिकती हैं।
1980 में अनंत पई ने हिंदी और अंगरेजी में बच्चों की एक लोकप्रिय पत्रिका ‘टिंकल’ का भी प्रकाशन शुरू किया। इस पत्रिका में अंकल पई के नाम से वह बच्चों के सवालों का जवाब देते थे। यह पत्रिका बच्चों में इस कदर मशहूर थी कि जिसके सवाल उसमें छप जाते थे, वह बच्चा मुहल्ले का हीरो तो हो ही जाता था। इसी दौरान अनंत पई ने शिकारी शंभू, कालिया द क्रो, तंत्री द मंत्री ,‘रामू और श्यामू’ और ‘कपिश’ जैसे लोकप्रिय कॉमिक किरदारों को जन्म दिया, जो वर्षों तक भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे। आज जब पई हमारे बीच नहीं हैं, तो सबके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारे देश के कार्टून किरदार भी अब विदेशी रंग में रंग जाएंगे। क्योंकि, तकनीकी विस्फोट और साधनों के लोकतंत्रीकरण से विदेशी कार्टून किरदारों की लंबी फौज हमारे घरों में आ घुसी है। ऐसे में अपने देश में कार्टून के किरदारों को जन्म देने वाले क्या उस रास्ते पर चलेंगे, जो अंकल पई ने दिखाया था। क्या डोरेमॉन के जमाने में शिकारी शंभू की कोई सुनेगा? कई पीढ़ी जिन कथाओं को पढ़ते हुए और जिन कार्टून किरदारों को देखते हुए जवान हुई है, क्या उन किरदारों को कोई याद करनेवाला नहीं होगा? शायद ऐसा नहीं होगा, क्योंकि देश की भाषा में देश की मासूमियत को मुसकान देने के जो फॉरमूले चाचा पई ने दिए है, वे जल्दी नहीं चूकने वाले।
पूरब-पश्चिम का अंतर गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर कुशल चित्रकार भी थे। एक बार उन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया। फ्रांस के कला-मर्मज्ञ रोथेंस्टाइन तथा फ्रेंच आर्टिस्ट एन्ड्रीकारपेल्स गुरुदेव के मित्र थे। उन्होंने आग्रह किया कि वह अपने साथ कुछ चित्र भी लेते आएं। फ्रांस में उनके कला-चित्रों की धूम मच गई। अमेरिका में भी प्रदर्शनी लगाने का आग्रह किया गया। उनके व्याख्यान सुनकर बुद्धिजीवी लट्टू हो गए।
उन्होंने व्याख्यान में कहा, ‘अथाह भौतिक साधनों व अपार समृद्धि के बावजूद पश्चिम के देशों में मुझे आत्मिक संतोष व सच्चे सुख की अनुभूति नहीं हो पाई। वे सच्ची सुख-शांति के लिए पूर्व के आध्यात्मिक संस्कारों की ओर टकटकी लगाए हुए हैं।’ गुरुदेव ने एक समारोह में स्पष्ट कहा, ‘पश्चिम के विज्ञान का बोलबाला अवश्य है, किंतु मानवीय संवेदना लुप्त होती दिखाई दे रही है। विज्ञान की ओर असंतुलित दौड़ एक दिन विनाशकारी सिद्ध होगी।’
वाशिंगटन में एक बुद्धिजीवी ने गुरुदेव से प्रश्न किया, ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘जब मैं काव्य सृजन करता हूं, उस समय मुझे ईश्वर का साक्षात्कार होता है।’ उनसे पूछा गया, ‘क्या आप ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण दे सकते हैं?’ गुरुदेव ने कहा, ‘इस पृथ्वी पर ऐसा बहुत कुछ है, जिसके बारे में हम अनभिज्ञ हैं। किंतु क्या यह दावा कर सकते हैं कि वह सब नहीं है? इसलिए ईश्वर को प्रत्यक्ष देखने के बजाय हम विभिन्न समय में उसकी कृपा की अनुभूति करते हैं।’
बुद्धिजीवी उनका तर्क सुन उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर चला गया।
उन्होंने व्याख्यान में कहा, ‘अथाह भौतिक साधनों व अपार समृद्धि के बावजूद पश्चिम के देशों में मुझे आत्मिक संतोष व सच्चे सुख की अनुभूति नहीं हो पाई। वे सच्ची सुख-शांति के लिए पूर्व के आध्यात्मिक संस्कारों की ओर टकटकी लगाए हुए हैं।’ गुरुदेव ने एक समारोह में स्पष्ट कहा, ‘पश्चिम के विज्ञान का बोलबाला अवश्य है, किंतु मानवीय संवेदना लुप्त होती दिखाई दे रही है। विज्ञान की ओर असंतुलित दौड़ एक दिन विनाशकारी सिद्ध होगी।’
वाशिंगटन में एक बुद्धिजीवी ने गुरुदेव से प्रश्न किया, ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘जब मैं काव्य सृजन करता हूं, उस समय मुझे ईश्वर का साक्षात्कार होता है।’ उनसे पूछा गया, ‘क्या आप ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण दे सकते हैं?’ गुरुदेव ने कहा, ‘इस पृथ्वी पर ऐसा बहुत कुछ है, जिसके बारे में हम अनभिज्ञ हैं। किंतु क्या यह दावा कर सकते हैं कि वह सब नहीं है? इसलिए ईश्वर को प्रत्यक्ष देखने के बजाय हम विभिन्न समय में उसकी कृपा की अनुभूति करते हैं।’
बुद्धिजीवी उनका तर्क सुन उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर चला गया।
भविष्य की तैयारी
पिता की अर्थी लोगों की दी हुई भीख के सहारे बनाई गई है, यह विचार उसे बेहद भारी मालूम होने लगा था। मंगनी के पैसों से पिता का संस्कार! घाट पर पहुंचते ही भिखमंगों की भीड़ ने घेर लिया। अधनंगे कृषकाय भिखमंगे, जिनको देखने से ही मन में करुणा पैदा होने लगती थी। वे हाथ फैला-फैला कर करुणा उपजाने की कोशिशें करते हुए उससे भीख मांगने लगे थे। उस मौके पर धीरज के अंदर इतना साहस नहीं बचा था कि वह उनमें से किसी के चेहरे को भी ठीक तरह से आंखों में आंखे डाल कर देख सके। उसे लगा कि वह खुद भी घाट पर बैठे हुए उन्हीं भिखमंगों की कतार में शामिल है और उसे अपने लिए घाट पर बैठने की एक जगह की तलाश है।
दाह-संस्कार के बाद घर की ओर लौटते हुए उसने लकड़ियों की कीमत जमा कर दी। उसे अदा कर देने के बाद धीरज अपने पंडित की ओर मुड़ा।
‘पंडितजी, आपकी दक्षिणा!’
‘तुमसे कोई दक्षिणा नहीं धीरज!’ ब्राह्मण ने अपनी दक्षिणा लेने से इंकार कर दिया। घाट पर ब्राह्मण का अपनी परंपरागत दक्षिणा लेने से इंकार कर देना उसे सबसे ज्यादा खल गया। पंडितजी उसे स्पष्ट तौर पर यह निर्देश दे रहे हैं कि ये पैसे घर ले जाओ और इनसे बेसहारा हो गए अपने परिवार की कुछ दिनों की रोटी का जुगाड़ कर लेना।
घाट का पैसा घर के अंदर! धीरज घाट से निषिद्ध पैसों की भीख अपनी जेब के अंदर ले कर घर की ओर लौटने लगा है। कई दिनों तक वह एक भयंकर मानसिक सदमे में रहा। वे दिन और उसके बाद के कई दिन, धीरज के परिवार ने कैसी विकट परिस्थितियों में, अपने लोगों से मिलने वाली सहायता के सहारे गुजारे थे, उन यादों को वह कभी भुला नहीं पाया। बाद की जिंदगी की शुरुआत उसने ट्यूशन से की थी। उसकी बेकारी पर तरस खाते हुए लोग अपने और अपनों के बच्चों को उसके पास भेजने-भिजवाने लगे। पढ़ाने में वह अपनी पूरी शक्ति और मेधा खपाने लगा। जिन बच्चों के माता-पिता उनके कभी सफल हो पाने के बारे में पूरी तरह नाउम्मीद हो चुके थे, वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए मंजिलों पर पहुंचने लगे। उसके पढ़ाए बच्चे कक्षाओं में अव्वल आने लगे। शहर में उसका नाम फैलने लगा। खुद भी प्राइवेट परीक्षाओं की सीढ़ियां पार करते हुए उसने एमए कर लिया। उसे कॉलेज में अध्यापन की नौकरी भी मिल गई। उसने देवकी की पढ़ाई भी जारी रखवाई। उसका विवाह भी कर लिया। नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में उसकी गिनती होने लगी। मां के जीवन-काल में ही धीरज ने अपने लिए एक घर भी बना लिया। और मां की इच्छाओं का अनुपालन करते हुए अपने लिए एक दुलहन भी ले आया।
इतवार का दिन। धीरज का इकलौता बेटा शशांक। उसे आज दफ्तर नहीं जाना है। उसके पिता ने आज आखिरी किनारे पर बनी कोठरी को खाली करने को कह दिया है। उसके अंदर किसी का भी प्रवेश वर्जित कर दिया है। उसकी मां भी वहां नहीं जा सकती, बहू भी नहीं। वह ऐसी जगह पर बनाई गई थी कि कोई आने-जाने वाला कोशिश करने पर भी वहां ताक-झांक न कर सके। उस कोठरी के ताले की चाभी हमेशा धीरज के पास रहती है। ‘मेरे जीते-जी इस कोठरी के अंदर किसी को जाने की इजाजत नहीं है।’ एक दिन उसने शशांक से अकेले में एक बात कही थी, ‘बेटे! मेरे जाने के बाद तुम मेरी चाभी अपने कब्जे में ले लेना। घाट पर ले जाने के लिए कोई और काम बाद में किया जाना चाहिए।’
शशांक की बेटी का विवाह अपने ही घर से करने का निर्णय लिया गया था। बारात के स्वागत के लिए घर के बाहर ही शामियाना लगा दिया जाएगा।
‘मिठाइयां बाजार से खरीद लें, पापा?’
‘मेरे खयाल में बाजार खरीदने के बजाय हलवाई के कारीगरों को घर पर ही बुलवा लेना ठीक रहेगा शशांक। वे घरातियों के लिए रसोई भी बना लेंगे।
कारीगर से मिठाइयां और नमकीन बनवा लिए गए। समस्या उनको किसी अलग कमरे में सुरक्षित रखने की हुई। परिवार वालों ने समस्या धीरज के सामने पेश कर दी। आशा थी कि वह मंगलकार्य की मिठाइयों के लिए अपनी कोठरी का उपयोग कर लेने देगा। लेकिन धीरज ने साफ मना कर दिया। आंगन में ही एक और तंबू लगवा कर काम चलाना पड़ा। बारात के लिए शानदार शामियाना लगवाया गया था। उसे देख कर ऐसा लग रहा था कि वहां पर एक दोमंजिला, खूबसूरत, पक्का भवन बना हो। वैसा भव्य भवन और इंतजामात को देख कर सभी लोग आश्चर्य में डूबने लगे थे। बारात के आते ही अचानक बहुत जोर का पानी बरसने लगा। साथ में जबर्दस्त आंधी। लोग अकबका गए। बारात के पहुंचते-पहुंचते शामियाने की छत के ऊपर पानी भर गया। पानी के दबाव और आंधी के कारण शामियाने के चमकते हुए खंभे एक-एक कर नीचे गिरने लगे। भगदड़ मच गई। मैदान, जिसमें शामियाना खड़ा था, घुटनों तक के पानी से लबालब हो गया। बारातियों को सुरक्षित स्थानों पर बैठाने की तात्कालिक समस्या पैदा हो गई। धीरज का पूरा परिवार उन सभी लोगों को अपने घर के कमरों के अंदर लेते आने में जुट गया। कमरों के अंदर रिश्तेदारों के कई दिन पहले से आ जाने से वहां पहले से ही कहीं तिल रखने की जगह बाकी नहीं थी। संकट के उस मौके पर शशांक ने अपने पिता से पूछा, ‘पापा, कोठरी का ताला खोला जा सकता है?’
‘वह ताला नहीं खोला जा सकता शशांक।’
कुछ दिन बाद शहरवासियों को धीरज की अचानक हुई मृत्यु का समाचार सुनाई दिया। पिता के निर्देशानुसार शशांक ने कोठरी का दरवाजा खोला। वहां रखे तीन संदूकों में एक के ऊपर एक बड़ा लिफाफा रखा था। उस पर मोटे, लाल अक्षरों में एक बड़े कोष्टक के अंदर लिखा था,‘ पहले इसे खोलो।’ लिफाफे के अंदर एक कागज पर लिखा था, ‘मेरे पिता एक ईमानदार, कर्तव्यपरायण, नेकदिल इंसान थे। उनके सद्गुणों का भुगतान हमारे परिवार को करना पड़ता था। उनकी अचानक मौत के वक्त परिवार के पास कफन तक के पैसे नहीं थे। दाह-संस्कार का पूरा खर्चा लोगों ने चंदा करके मेरी जेब में डाल दिया था। मैं उस प्रसंग को आजीवन भुला नहीं पाया। मेरे मन में तभी से यह विचार प्रबल होने लगा था कि हर भारतवासी को अपने जीवन काल में अपनी मौत का सामान जमा कर लेना चाहिए। उसका एक मुख्य कारण रोज-ब-रोज बढ़ती मंहगाई भी है। हमारे अपने हाथ में कुछ भी नहीं रह गया है। सब कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में है। मैंने इस कोठरी में इतना सामान जमा कर लिया है कि मेरी मौत के बाद मुझे घाट पर ले जाने, तेरहवीं और श्राद्ध जैसे संस्कारों के लिए पैसों या साधनों की कमी आड़े न आए। मेरा यह भी सुझाव है आम आदमी को मौत की ओर धकेल रही हमारी सरकारों को इस दिशा में विशेष पहल करनी चाहिए। मेरा अनुभव है कि आम भारतवासी मरने से नहीं डरता, वह अपनी मौत के बाद उत्तराधिकारियों के सामने पैदा हो जाने वाली विकराल समस्याओं से डरने लगा है। हमारी सरकारें, चाहे वे किसी भी पार्टी की हों, आम आदमी का जीना दूभर करने लगी हैं। हमारी कीमत पर राजनेताओं का दाह-संस्कार करने वाली सरकारों को एक ‘मृत्यु-कोष’ की स्थापना करनी चाहिए, जिसका संचालन करने के लिए एक अलग ‘संस्कार मंत्रालय’ का गठन किया जाना चाहिए। संविधान में संशोधन करके प्रत्येक भारतवासी को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि उसकी मृत्यु हो जाने पर राज्य की ओर से घाटों पर नियुक्त अधिकारी निःशुल्क और राजकीय खर्चे पर उसका संस्कार करवा दे। और वह अधिकारी बगैर भेदभाव के मुसलमानों व ईसाइयों को कब्र में जगह की व्यवस्था करे और दीगर वांछित खर्चों की भी व्यवस्था करे ताकि किसी को हलवाई की दुकान के बाहर खड़े होकर दादा मियां का फातिहा न पढ़ना पड़े।’
दाह-संस्कार के बाद घर की ओर लौटते हुए उसने लकड़ियों की कीमत जमा कर दी। उसे अदा कर देने के बाद धीरज अपने पंडित की ओर मुड़ा।
‘पंडितजी, आपकी दक्षिणा!’
‘तुमसे कोई दक्षिणा नहीं धीरज!’ ब्राह्मण ने अपनी दक्षिणा लेने से इंकार कर दिया। घाट पर ब्राह्मण का अपनी परंपरागत दक्षिणा लेने से इंकार कर देना उसे सबसे ज्यादा खल गया। पंडितजी उसे स्पष्ट तौर पर यह निर्देश दे रहे हैं कि ये पैसे घर ले जाओ और इनसे बेसहारा हो गए अपने परिवार की कुछ दिनों की रोटी का जुगाड़ कर लेना।
घाट का पैसा घर के अंदर! धीरज घाट से निषिद्ध पैसों की भीख अपनी जेब के अंदर ले कर घर की ओर लौटने लगा है। कई दिनों तक वह एक भयंकर मानसिक सदमे में रहा। वे दिन और उसके बाद के कई दिन, धीरज के परिवार ने कैसी विकट परिस्थितियों में, अपने लोगों से मिलने वाली सहायता के सहारे गुजारे थे, उन यादों को वह कभी भुला नहीं पाया। बाद की जिंदगी की शुरुआत उसने ट्यूशन से की थी। उसकी बेकारी पर तरस खाते हुए लोग अपने और अपनों के बच्चों को उसके पास भेजने-भिजवाने लगे। पढ़ाने में वह अपनी पूरी शक्ति और मेधा खपाने लगा। जिन बच्चों के माता-पिता उनके कभी सफल हो पाने के बारे में पूरी तरह नाउम्मीद हो चुके थे, वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए मंजिलों पर पहुंचने लगे। उसके पढ़ाए बच्चे कक्षाओं में अव्वल आने लगे। शहर में उसका नाम फैलने लगा। खुद भी प्राइवेट परीक्षाओं की सीढ़ियां पार करते हुए उसने एमए कर लिया। उसे कॉलेज में अध्यापन की नौकरी भी मिल गई। उसने देवकी की पढ़ाई भी जारी रखवाई। उसका विवाह भी कर लिया। नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में उसकी गिनती होने लगी। मां के जीवन-काल में ही धीरज ने अपने लिए एक घर भी बना लिया। और मां की इच्छाओं का अनुपालन करते हुए अपने लिए एक दुलहन भी ले आया।
इतवार का दिन। धीरज का इकलौता बेटा शशांक। उसे आज दफ्तर नहीं जाना है। उसके पिता ने आज आखिरी किनारे पर बनी कोठरी को खाली करने को कह दिया है। उसके अंदर किसी का भी प्रवेश वर्जित कर दिया है। उसकी मां भी वहां नहीं जा सकती, बहू भी नहीं। वह ऐसी जगह पर बनाई गई थी कि कोई आने-जाने वाला कोशिश करने पर भी वहां ताक-झांक न कर सके। उस कोठरी के ताले की चाभी हमेशा धीरज के पास रहती है। ‘मेरे जीते-जी इस कोठरी के अंदर किसी को जाने की इजाजत नहीं है।’ एक दिन उसने शशांक से अकेले में एक बात कही थी, ‘बेटे! मेरे जाने के बाद तुम मेरी चाभी अपने कब्जे में ले लेना। घाट पर ले जाने के लिए कोई और काम बाद में किया जाना चाहिए।’
शशांक की बेटी का विवाह अपने ही घर से करने का निर्णय लिया गया था। बारात के स्वागत के लिए घर के बाहर ही शामियाना लगा दिया जाएगा।
‘मिठाइयां बाजार से खरीद लें, पापा?’
‘मेरे खयाल में बाजार खरीदने के बजाय हलवाई के कारीगरों को घर पर ही बुलवा लेना ठीक रहेगा शशांक। वे घरातियों के लिए रसोई भी बना लेंगे।
कारीगर से मिठाइयां और नमकीन बनवा लिए गए। समस्या उनको किसी अलग कमरे में सुरक्षित रखने की हुई। परिवार वालों ने समस्या धीरज के सामने पेश कर दी। आशा थी कि वह मंगलकार्य की मिठाइयों के लिए अपनी कोठरी का उपयोग कर लेने देगा। लेकिन धीरज ने साफ मना कर दिया। आंगन में ही एक और तंबू लगवा कर काम चलाना पड़ा। बारात के लिए शानदार शामियाना लगवाया गया था। उसे देख कर ऐसा लग रहा था कि वहां पर एक दोमंजिला, खूबसूरत, पक्का भवन बना हो। वैसा भव्य भवन और इंतजामात को देख कर सभी लोग आश्चर्य में डूबने लगे थे। बारात के आते ही अचानक बहुत जोर का पानी बरसने लगा। साथ में जबर्दस्त आंधी। लोग अकबका गए। बारात के पहुंचते-पहुंचते शामियाने की छत के ऊपर पानी भर गया। पानी के दबाव और आंधी के कारण शामियाने के चमकते हुए खंभे एक-एक कर नीचे गिरने लगे। भगदड़ मच गई। मैदान, जिसमें शामियाना खड़ा था, घुटनों तक के पानी से लबालब हो गया। बारातियों को सुरक्षित स्थानों पर बैठाने की तात्कालिक समस्या पैदा हो गई। धीरज का पूरा परिवार उन सभी लोगों को अपने घर के कमरों के अंदर लेते आने में जुट गया। कमरों के अंदर रिश्तेदारों के कई दिन पहले से आ जाने से वहां पहले से ही कहीं तिल रखने की जगह बाकी नहीं थी। संकट के उस मौके पर शशांक ने अपने पिता से पूछा, ‘पापा, कोठरी का ताला खोला जा सकता है?’
‘वह ताला नहीं खोला जा सकता शशांक।’
कुछ दिन बाद शहरवासियों को धीरज की अचानक हुई मृत्यु का समाचार सुनाई दिया। पिता के निर्देशानुसार शशांक ने कोठरी का दरवाजा खोला। वहां रखे तीन संदूकों में एक के ऊपर एक बड़ा लिफाफा रखा था। उस पर मोटे, लाल अक्षरों में एक बड़े कोष्टक के अंदर लिखा था,‘ पहले इसे खोलो।’ लिफाफे के अंदर एक कागज पर लिखा था, ‘मेरे पिता एक ईमानदार, कर्तव्यपरायण, नेकदिल इंसान थे। उनके सद्गुणों का भुगतान हमारे परिवार को करना पड़ता था। उनकी अचानक मौत के वक्त परिवार के पास कफन तक के पैसे नहीं थे। दाह-संस्कार का पूरा खर्चा लोगों ने चंदा करके मेरी जेब में डाल दिया था। मैं उस प्रसंग को आजीवन भुला नहीं पाया। मेरे मन में तभी से यह विचार प्रबल होने लगा था कि हर भारतवासी को अपने जीवन काल में अपनी मौत का सामान जमा कर लेना चाहिए। उसका एक मुख्य कारण रोज-ब-रोज बढ़ती मंहगाई भी है। हमारे अपने हाथ में कुछ भी नहीं रह गया है। सब कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में है। मैंने इस कोठरी में इतना सामान जमा कर लिया है कि मेरी मौत के बाद मुझे घाट पर ले जाने, तेरहवीं और श्राद्ध जैसे संस्कारों के लिए पैसों या साधनों की कमी आड़े न आए। मेरा यह भी सुझाव है आम आदमी को मौत की ओर धकेल रही हमारी सरकारों को इस दिशा में विशेष पहल करनी चाहिए। मेरा अनुभव है कि आम भारतवासी मरने से नहीं डरता, वह अपनी मौत के बाद उत्तराधिकारियों के सामने पैदा हो जाने वाली विकराल समस्याओं से डरने लगा है। हमारी सरकारें, चाहे वे किसी भी पार्टी की हों, आम आदमी का जीना दूभर करने लगी हैं। हमारी कीमत पर राजनेताओं का दाह-संस्कार करने वाली सरकारों को एक ‘मृत्यु-कोष’ की स्थापना करनी चाहिए, जिसका संचालन करने के लिए एक अलग ‘संस्कार मंत्रालय’ का गठन किया जाना चाहिए। संविधान में संशोधन करके प्रत्येक भारतवासी को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि उसकी मृत्यु हो जाने पर राज्य की ओर से घाटों पर नियुक्त अधिकारी निःशुल्क और राजकीय खर्चे पर उसका संस्कार करवा दे। और वह अधिकारी बगैर भेदभाव के मुसलमानों व ईसाइयों को कब्र में जगह की व्यवस्था करे और दीगर वांछित खर्चों की भी व्यवस्था करे ताकि किसी को हलवाई की दुकान के बाहर खड़े होकर दादा मियां का फातिहा न पढ़ना पड़े।’
Saturday, September 17, 2011
पटेल की विरासत
यदि प्रश्न उठे कि सरदार वल्लभाई झवेरदास पटेल के बहुगुणी जीवन की एक विशिष्टता गिनाओ, तो आज के सियासी परिप्रेक्ष्य में उत्तर यही होगा, ‘पटेल द्वारा अपने घर में वंशवाद का आमूल खात्मा।’ आखिर बचा कौन है इस कैकेयी-धृतराष्ट्री मनोवृत्ति से? महात्मा गांधी के बाद सरदार पटेल ही थे, जिनके आत्मजों का नाम-पता शायद ही कोई आमजन जानता हो।
पटेल का इकलौता पुत्र था, डाह्यालाल वल्लभभाई पटेल, जिससे उनके पिता ने सारे नाते तोड़ लिए थे। स्वतंत्रता के एक वर्ष बाद ही मुंबई के एक सार्वजनिक मंच से सरदार पटेल ने घोषणा कर दी थी कि उनके पद पर उनके पुत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः सार्वजनिक जीवन में शुचिता के लिए सत्ता और कुटुंब के मध्य रिश्ता नहीं होना चाहिए। पिता के निधन के बाद डाह्यालाल स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गए, जिसका गठन नेहरूवादी समाजवाद के खिलाफ किया गया था। सरदार पटेल की एक ही पुत्री थी मणिबेन पटेल, जो अविवाहित रहकर पिता की सेवा में रही, कोई लाभ का पद कभी नहीं लिया। सरदार पटेल का एक ही पोता था, विपिन पटेल, जो गुमनामी में जीता रहा। उसका जब निधन (12 मार्च 2004) दिल्ली में हुआ था, तो अंत्येष्टि में चंद लोग ही थे। लोगों को अखबारों से दूसरे दिन पता चला। हालांकि पटेल से प्रेरणा पाने का दावा करने वाले भाजपाई तब राजग सरकार में सत्तारूढ़ थे। वे नहीं आए। कांग्रेसी तो एक भी नहीं पहुंचा।
पटेल जब राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन के लिए 1931 में अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे, तो उनके पहले मोतीलाल-जवाहरलाल की जोड़ी उसी पद पर आरूढ़ हो चुकी थी। कांग्रेस में वंशवाद की शुरूआत भी तभी (दिसंबर 1929) से लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन से हुई थी। आज तक वही परिवारवाद चौथी पीढ़ी के राहुल गांधी के रूप में पल्लवित हो रही है। मगर पटेल के लिए राष्ट्र कुटुंब से पहले था।
पटेल को नेहरूवादियों ने समाजवाद-विरोधी तथा हिंदूवादी चित्रित किया था। समतावाद से पटेल को कोई आकर्षण नहीं था, क्योंकि उनका जन्म गुजरात में हुआ, जो आज भी समाजवाद के लिए ऊसर भूमि है। खुद गांधीजी समाजवादियों के निकट निजी रूप से थे, पर वैचारिक पैमाने पर कभी नहीं। सरदार पटेल तो इन सोशलिस्टों को विध्वंसक मानते थे। सोशलिस्टों, खासकर जयप्रकाश नारायण ने, पटेल पर आरोप लगाया था कि गांधीजी की हत्या के दोषी वह भी हैं, क्योंकि गृह मंत्री होने के नाते उन्होंने पर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं कराई थी। हालांकि सितंबर, 1974 को सूरत की एक जनसभा में जेपी ने चौबीस वर्षों बाद सार्वजनिक तौर पर स्वीकारा कि तब सोशलिस्ट जन नेहरूवादी प्रगतिशीलता के वैचारिक कुहासे से आच्छादित थे। पटेल को वे प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी मानते थे। नेहरू के बजाय पटेल, जेपी के आकलन में, योग्यतर प्रधानमंत्री होते। इन सोशलिस्टों द्वारा हिंदूवादी होने के मिथ्यारोप के बावजूद, पटेल ने हिंदू महासभा को दंडित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पहली बार दो फरवरी, 1948 को प्रतिबंधित किया गया। उन्होंने सरसंघचालक गुरु गोलवलकर को चेतावनी दी कि उनका संगठन हिंदुओं का संरक्षक है, मगर उसे मुसलमानों पर आक्रमण करने का हक नहीं है। पटेल ने गोलवलकर की गिरफ्तारी का आदेश भी कर दिया था। यों छत्तीस के आंकड़े के बावजूद सोशलिस्टों की एक मांग को सरदार पटेल पसंद करते थे। तब सड़क पर जेपी, लोहिया, अशोक मेहता जुलूस निकालते थे कि ब्रिटिश कॉमनवेल्थ से भारत नाता तोड़े, गुलामी की यह निशानी है। नेहरू नहीं माने। मान जाते, तो दिल्ली में इसी महीने संपन्न हुए खेलों का खेल न होता। पटेल अंगरेजों से कोई नाता-वास्ता नहीं चाहते थे। वह भुगत चुके थे कि किस प्रकार अंतिम गवर्नर जनरल माउंटबैटन ने हैदराबाद, कश्मीर, जूनागढ़ और भोपाल के रजवाड़ों की मदद कर खंडित भारत का मानचित्र बनाया था, जिसे पटेल ने मिटाया था।
जब जवाहरलाल नेहरू की सेक्यूलर सोच से तुलना के समय लोग सरदार पटेल की मुसलिम-विरोधी छवि निरुपित करते हैं, तो इतिहास-बोध से अपनी अनभिज्ञता वे दर्शाते हैं। स्वभावतः पटेल में किसान मार्का अक्खड़पन था। लखनऊ की एक सभा में पटेल ने कहा था, ‘भारतीय मुसलमानों को सोचना होगा कि अब वे दो घोड़ों पर सवारी नहीं कर सकते।’ इसे भारत में रह गए मुसलमानों ने हिंदुओं द्वारा ऐलान-ए- जंग कहा था। पटेल की इस उक्ति की भौगोलिक पृष्ठभूमि रही थी। अवध के अधिकांश मुसलमान जिन्ना के पाकिस्तानी आंदोलन के हरावल दस्ते में रहे। मुसलमानों की बाबत पटेल के कड़वे, मगर स्पष्टवादी उद्गार का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि अनन्य गांधीवादी होने के बावजूद वह सियासत तथा मजहब के घालमेल के कट्टर विरोधी थे। नेहरू के लिए तुष्टिकरण सियासी अपरिहार्यता बन गई थी। पटेल ने गरिमा बनाई रखी, भले ही उनके निधन के बाद नेहरू के साथियों ने नहीं। वरना पटेल की भी समाधि राजघाट के आसपास ही होती जहां नेहरू वंश के चार-चार लोगों के नाम चबूतरे बने हैं।
पटेल का इकलौता पुत्र था, डाह्यालाल वल्लभभाई पटेल, जिससे उनके पिता ने सारे नाते तोड़ लिए थे। स्वतंत्रता के एक वर्ष बाद ही मुंबई के एक सार्वजनिक मंच से सरदार पटेल ने घोषणा कर दी थी कि उनके पद पर उनके पुत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः सार्वजनिक जीवन में शुचिता के लिए सत्ता और कुटुंब के मध्य रिश्ता नहीं होना चाहिए। पिता के निधन के बाद डाह्यालाल स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गए, जिसका गठन नेहरूवादी समाजवाद के खिलाफ किया गया था। सरदार पटेल की एक ही पुत्री थी मणिबेन पटेल, जो अविवाहित रहकर पिता की सेवा में रही, कोई लाभ का पद कभी नहीं लिया। सरदार पटेल का एक ही पोता था, विपिन पटेल, जो गुमनामी में जीता रहा। उसका जब निधन (12 मार्च 2004) दिल्ली में हुआ था, तो अंत्येष्टि में चंद लोग ही थे। लोगों को अखबारों से दूसरे दिन पता चला। हालांकि पटेल से प्रेरणा पाने का दावा करने वाले भाजपाई तब राजग सरकार में सत्तारूढ़ थे। वे नहीं आए। कांग्रेसी तो एक भी नहीं पहुंचा।
पटेल जब राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन के लिए 1931 में अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे, तो उनके पहले मोतीलाल-जवाहरलाल की जोड़ी उसी पद पर आरूढ़ हो चुकी थी। कांग्रेस में वंशवाद की शुरूआत भी तभी (दिसंबर 1929) से लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन से हुई थी। आज तक वही परिवारवाद चौथी पीढ़ी के राहुल गांधी के रूप में पल्लवित हो रही है। मगर पटेल के लिए राष्ट्र कुटुंब से पहले था।
पटेल को नेहरूवादियों ने समाजवाद-विरोधी तथा हिंदूवादी चित्रित किया था। समतावाद से पटेल को कोई आकर्षण नहीं था, क्योंकि उनका जन्म गुजरात में हुआ, जो आज भी समाजवाद के लिए ऊसर भूमि है। खुद गांधीजी समाजवादियों के निकट निजी रूप से थे, पर वैचारिक पैमाने पर कभी नहीं। सरदार पटेल तो इन सोशलिस्टों को विध्वंसक मानते थे। सोशलिस्टों, खासकर जयप्रकाश नारायण ने, पटेल पर आरोप लगाया था कि गांधीजी की हत्या के दोषी वह भी हैं, क्योंकि गृह मंत्री होने के नाते उन्होंने पर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं कराई थी। हालांकि सितंबर, 1974 को सूरत की एक जनसभा में जेपी ने चौबीस वर्षों बाद सार्वजनिक तौर पर स्वीकारा कि तब सोशलिस्ट जन नेहरूवादी प्रगतिशीलता के वैचारिक कुहासे से आच्छादित थे। पटेल को वे प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी मानते थे। नेहरू के बजाय पटेल, जेपी के आकलन में, योग्यतर प्रधानमंत्री होते। इन सोशलिस्टों द्वारा हिंदूवादी होने के मिथ्यारोप के बावजूद, पटेल ने हिंदू महासभा को दंडित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पहली बार दो फरवरी, 1948 को प्रतिबंधित किया गया। उन्होंने सरसंघचालक गुरु गोलवलकर को चेतावनी दी कि उनका संगठन हिंदुओं का संरक्षक है, मगर उसे मुसलमानों पर आक्रमण करने का हक नहीं है। पटेल ने गोलवलकर की गिरफ्तारी का आदेश भी कर दिया था। यों छत्तीस के आंकड़े के बावजूद सोशलिस्टों की एक मांग को सरदार पटेल पसंद करते थे। तब सड़क पर जेपी, लोहिया, अशोक मेहता जुलूस निकालते थे कि ब्रिटिश कॉमनवेल्थ से भारत नाता तोड़े, गुलामी की यह निशानी है। नेहरू नहीं माने। मान जाते, तो दिल्ली में इसी महीने संपन्न हुए खेलों का खेल न होता। पटेल अंगरेजों से कोई नाता-वास्ता नहीं चाहते थे। वह भुगत चुके थे कि किस प्रकार अंतिम गवर्नर जनरल माउंटबैटन ने हैदराबाद, कश्मीर, जूनागढ़ और भोपाल के रजवाड़ों की मदद कर खंडित भारत का मानचित्र बनाया था, जिसे पटेल ने मिटाया था।
जब जवाहरलाल नेहरू की सेक्यूलर सोच से तुलना के समय लोग सरदार पटेल की मुसलिम-विरोधी छवि निरुपित करते हैं, तो इतिहास-बोध से अपनी अनभिज्ञता वे दर्शाते हैं। स्वभावतः पटेल में किसान मार्का अक्खड़पन था। लखनऊ की एक सभा में पटेल ने कहा था, ‘भारतीय मुसलमानों को सोचना होगा कि अब वे दो घोड़ों पर सवारी नहीं कर सकते।’ इसे भारत में रह गए मुसलमानों ने हिंदुओं द्वारा ऐलान-ए- जंग कहा था। पटेल की इस उक्ति की भौगोलिक पृष्ठभूमि रही थी। अवध के अधिकांश मुसलमान जिन्ना के पाकिस्तानी आंदोलन के हरावल दस्ते में रहे। मुसलमानों की बाबत पटेल के कड़वे, मगर स्पष्टवादी उद्गार का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि अनन्य गांधीवादी होने के बावजूद वह सियासत तथा मजहब के घालमेल के कट्टर विरोधी थे। नेहरू के लिए तुष्टिकरण सियासी अपरिहार्यता बन गई थी। पटेल ने गरिमा बनाई रखी, भले ही उनके निधन के बाद नेहरू के साथियों ने नहीं। वरना पटेल की भी समाधि राजघाट के आसपास ही होती जहां नेहरू वंश के चार-चार लोगों के नाम चबूतरे बने हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)